जिए जा रहे हैं

ये क्या मक्सद है जो जिए जा रहे हैं,
खून के घूँट पिए जा रहे हैं,
ख्वाब काँटों से सिये जा रहे हैं ,
ये क्या मक्सद है जो जिए जा रहे हैं?

रात फिर दिन, दिन फिर रात, बढ़ रहा है बस अपने आप,
ज़िन्दगी है जो इन पहरों के बीच चले जा रही है,
दो पल के लिए फिर ठहर के सोचते हैं हम कभी-कभी
क्या यही सच है? क्या इसी के लिए हम बने हैं?

न जाने कितनी बार भूख लगी, न जाने कितनी बार पानी है पिया।
और न जाने कितनी बार सब सुख-सुविधाओं का मज़ा है लिया।
हर दिन बस वही-वही काम हम किये जा रहे हैं,
ये क्या मक्सद है जो जिए जा रहे हैं?

दुःख-सुख, प्रेम-घृणा सब दिए इस ज़िन्दगी ने,
खुशियों पर भी चार-चाँद लगा दिए इस ज़िन्दगी ने,
माँ-बाप, भाई और बहन सबका प्रेम भरपूर है मिला,
फिर भी क्यूँ है इस ज़िन्दगी से निरंतर ये गिला?

ये क्या राज़ है ये जो सब बस हो रहा है,
हर दिन वही दौड़ और हर रात इंसान सो रहा है,
मन के बनाये सब जंजालों में बस समय व्यतीत किये जा रहे हैं,
ये क्या मक्सद है जो हम बस यूं ही जिए जा रहे हैं?